क्या वाकई भारत पाकिस्तान की तरफ जाने वाला नदी का पानी रोक सकता है?

 क्या वाकई भारत पाकिस्तान की तरफ जाने वाला नदी का पानी रोक सकता है?

 यही सवाल आजकल हर किसी के दिमाग में घूम रहा है, खासकर तब से जब भारत ने पाकिस्तान के साथ पानी बाँटने वाले बड़े समझौते को सस्पेंड कर दिया — वो भी उस दर्दनाक हमले के बाद जो हाल ही में भारतीय कश्मीर में हुआ।


अब भारत की तरफ से ये भी कहा जा रहा है कि मौजूदा ज़रूरतों को देखते हुए — जैसे कि सिंचाई, पीने के पानी की कमी और हाइड्रोपावर — उस पुराने समझौते को रिव्यू और मॉडिफाई करने की ज़रूरत है। साथ ही क्लाइमेट चेंज भी अब एक बड़ा फैक्टर बन चुका है।

वैसे देखा जाए तो दोनों देश कई बार इस पानी के मुद्दे को लेकर लीगल रास्तों पर भिड़ चुके हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी एक देश (और वो भी अपस्ट्रीम वाला, यानी भारत) ने खुद से इस समझौते को सस्पेंड कर दिया हो। 


क्या वाकई भारत पाकिस्तान की तरफ जाने वाला नदी का पानी रोक सकता है?


अब सवाल ये है — क्या वाकई भारत उस पानी को रोक सकता है?

 क्या भारत इंडस नदी और उसकी दो बड़ी सहायक नदियों का बहाव रोककर पाकिस्तान को उसका पानी नहीं जाने देगा?

तो जानकारों का कहना है कि सच्चाई ये है कि भारत के पास इतनी बड़ी स्टोरेज कैपेसिटी ही नहीं है कि वो हाई-फ्लो टाइम में पश्चिम की नदियों का पूरा पानी रोक सके। ना ही उतनी लंबी-चौड़ी नहरों का जाल है कि वो पानी को कहीं और मोड़ सके।

"भारत के ज्यादातर प्रोजेक्ट रन-ऑफ-द-रिवर टाइप के हैं," साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के हेमांशु ठाकुर कहते हैं। यानी ये प्रोजेक्ट्स पानी को जमा नहीं करते, बल्कि बहते हुए पानी से बिजली बनाते हैं।

असल में तो भारत अपने हिस्से का जो 20% पानी है, वो भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाया है। इसी वजह से अब वहां नई स्टोरेज बनाने की बात हो रही है, जिससे पाकिस्तान को आपत्ति है — वो कहता है कि ये समझौते की शर्तों के खिलाफ है।

अब जब भारत ने समझौते को सस्पेंड कर दिया है, तो वो चाहे तो अपने प्रोजेक्ट्स की डीटेल्स पाकिस्तान से छुपा सकता है। यानी पहले जैसा ट्रांसपेरेंसी वाला सिस्टम अब नहीं रहेगा।

पर ये इतना आसान भी नहीं है — वहां के पहाड़ी इलाके, लोकल विरोध, और प्रोजेक्ट्स की स्लो स्पीड की वजह से अब तक कोई बड़ा बदलाव जमीन पर दिखा नहीं है।

2016 में भी ऐसा ही हमला हुआ था, तब भारत ने कहा था कि वो पानी के प्रोजेक्ट्स को तेजी से बनाएगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि बहुत ज़्यादा प्रगति नहीं हुई।

अब असली असर कब दिखेगा? जब सूखा पड़ेगा — यानी जब पानी की मात्रा पहले से कम होगी। तभी स्टोरेज और टाइमिंग सबसे ज़्यादा मायने रखेगी। पाकिस्तान को तब असली झटका लग सकता है।

टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर हसन एफ खान ने 'डॉन' अखबार में लिखा कि सूखे समय में भारत अगर अपनी स्टोरेज पावर बढ़ा लेता है, तो पाकिस्तान को पानी की किल्लत साफ तौर पर महसूस हो सकती है।

ये Indus Waters Treaty (1960) वैसे दो बार की जंग के बीच भी जिंदा रही — यानी इतनी मजबूत थी। लेकिन अब भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ कई कदम उठाए हैं, जिसमें ये पानी वाला फैसला भी शामिल है।

पाकिस्तान का कहना है कि अगर भारत पानी रोकता है, तो इसे 'युद्ध की कार्यवाही' माना जाएगा। 


क्या वाकई भारत पाकिस्तान की तरफ जाने वाला नदी का पानी रोक सकता है?


इस समझौते के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियाँ — रावी, ब्यास और सतलुज — दी गई थीं, और पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियाँ — सिंधु, झेलम और चिनाब — जिनसे पाकिस्तान की 80% खेती और लगभग एक-तिहाई हाइड्रोपावर चलता है।

भारत को पाकिस्तान के साथ बाढ़ से जुड़ा हाइड्रोलॉजिकल डेटा भी शेयर करना होता था। लेकिन अब भारत के पूर्व IWT कमिश्नर प्रदीप कुमार सक्सेना का कहना है कि अब भारत को ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।

वैसे पाकिस्तान का ये भी कहना है कि भारत पहले ही सिर्फ 40% डेटा दे रहा था।


हर बार जब भारत-पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर तनाव बढ़ता है, तो ये सवाल उठता है कि क्या ऊपर वाला देश (भारत) पानी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है? इसे 'वॉटर बम' भी कहते हैं — यानी पानी रोकना और फिर एकदम से छोड़ देना, जिससे नीचे वाले देश (पाकिस्तान) में भारी तबाही हो सकती है।

पर एक्सपर्ट्स कहते हैं, भारत खुद भी डैम्स के पास है और अपने इलाकों को पहले डुबा देगा अगर ऐसा कुछ किया। हाँ, एक चीज़ ज़रूर हो सकती है — वो है डैम्स से सिल्ट (कीचड़) को अचानक निकालना, जिससे नीचे पाकिस्तान में नुकसान हो सकता है।

इंडस जैसी हिमालयी नदियाँ बहुत सारा सिल्ट लाती हैं, जो डैम्स में जमा हो जाता है। अगर भारत बिना बताए एकदम से ये सिल्ट छोड़े, तो पाकिस्तान को दिक्कत हो सकती है।

और बड़ा पिक्चर ये है कि भारत खुद भी चाइना से डाउनस्ट्रीम है — ब्रह्मपुत्र पर। और इंडस नदी की शुरुआत भी तिब्बत से होती है।

2016 में जब भारत ने कहा था "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते," तब चीन ने यारलुंग त्सांगपो (जो भारत में ब्रह्मपुत्र बनती है) की एक सहायक नदी को रोक दिया था।

अब तो चीन वहां दुनिया का सबसे बड़ा डैम बनाने जा रहा है — जिससे भारत को डर है कि चीन को पानी का बहाव कंट्रोल करने की ताकत मिल जाएगी।

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